Tuesday, May 28, 2019

नौकरी की परीक्षाएं दे रहीं थीं, बन गईं सबसे युवा सांसद

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आने से पहले तक ओडिशा की रहने वालीं चंद्राणी मुर्मू भी सामान्य लड़की की तरह थीं.
ज़्यादा वक़्त नहीं बीता जब वो इंजीनियरिंग करके सरकारी नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं दे रही थीं. लेकिन, चुनावी नतीजों के बाद उनके करियर की दिशा ही बदल गई है.
चंद्राणी मुर्मू ओडिशा में क्योंझर लोकसभा सीट से जीत कर संसद पहुंची हैं और सबसे युवा महिला सांसद बनी हैं. 25 साल 11 महीने की उम्र में चंद्राणी ने एक और रिकॉर्ड अपने नाम किया है. वह सबसे कम उम्र की सांसद भी बन गई हैं.
कुछ समय पहले तक चंद्राणी किसी भी अन्य युवा की तरह एक अच्छे करियर के लिए कोशिश कर रही थीं. लेकिन, अचानक उनकी राहें राजनीति की तरफ़ मुड़ गईं.
चंद्राणी कहती हैं, ''मैं राजनीति में अचानक ही आ गई. पढ़ाई करते हुए कभी सोचा ही नहीं था कि राजनीति में आऊंगी. इसे मेरी क़िस्मत बोलिए या सौभाग्य कि मैं आज यहां हूं और इसके लिए मैं सबकी आभारी हूं.''
''दरअसल, क्योंझर महिला आरक्षित सीट है. इस पर चुनाव लड़ने के लिए सीधे मुझसे तो बात नहीं हुई, लेकिन मेरे मामा जी के ज़रिए मुझसे पूछा गया था. वो एक पढ़ी-लिखी उम्मीदवार भी ढूंढ रहे थे. शायद मैं उन्हें इस क़ाबिल लगी कि इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर पाऊंगी और इसलिए मुझे चुना गया.''
चंद्राणी मुर्मू ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया हुआ है और वो सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रही थीं. समय-समय पर प्रतियोगी परिक्षाएं भी देती थीं. चंद्राणी के परिवार में माता-पिता के अलावा दो बहनें हैं. वो संयुक्त परिवार में रहती हैं.
इन लोकसभा चुनावों में वो बीजू जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ी हैं और इस सफलता के लिए जनता और बीजेडी प्रमुख नवीन पटनायक को श्रेय देती हैं.
वह कहती हैं, ''सबसे युवा सांसद होने की मुझे बहुत ख़ुशी है और ये मेरी ज़िंदगी का गौरवान्वित करने वाला पल है. इसका संपूर्ण श्रेय मैं मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को देना चाहूंगी क्योंकि उन्होंने मुझे ये मौक़ा दिया है.
चंद्राणी मुर्मू को राजनीति एक तरह से विरासत में मिली है. उनके पिताजी के परिवार में तो कोई राजनीति में नहीं है लेकिन उनके नाना हरिहर सोरेन पूर्व सांसद रह चुके हैं.
अपने नाना को अपना रोल मॉडल बताते हुए चंद्राणी कहती हैं, ''नाना जी के कारण घर पर राजनीतिक माहौल पहले से ही था. हालांकि, उनके बाद कोई भी सक्रिय राजनीति में नहीं आया लेकिन राजनीति में जो भी दिलचस्पी है वो नाना जी के ही कारण है. आज सभी कह रहे हैं कि ये हरिहर सोरेने की नातिन हैं. उनका नाम फिर से लिया जा रहा है.''
एक आदिवासी इलाक़े से होने के कारण चंद्राणी वहां मुख्य तौर पर शिक्षा पर काम करना चाहती हैं. वह कहती हैं, ''हमारा ज़िला आदिवासी इलाक़ा है. यहां लोगों के विकास के लिए सरकार की तरफ़ से बहुत सारी योजनाएं हैं, लेकिन लोग शिक्षा से वंचित हैं. मैं इसके लिए काम करूंगी क्योंकि किसी भी इलाक़े के विकास के लिए वहां के लोगों का जागरूक होना ज़रूरी है.''
मतदान से कुछ समय पहले ही चंद्राणी मुर्मू को लेकर एक विवादित वीडियो भी प्रचारित किया गया था.
चंद्राणी इसे उनको बदनाम करने की साज़िश बताती हैं. उनका कहना है, ''मेरे लिए चुनावी प्रचार बिल्कुल भी आसान नहीं था. वो उतार-चढ़ाव वाले दिन थे. उस वीडियो से मुझे बहुत हैरानी हुई थी लेकिन आख़िर में जीत सच की ही होती है. साथ ही मैं चाहूँगी कि जिस तरह से मुझे मौक़ा मिला है उसी तरह दूसरों को भी मिले.''

Wednesday, May 15, 2019

विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के तकनीकी पेंच

साल 2011 में सरकार ने संसद को बताया था कि देश के कुल 11 राज्यों को विशेष राज्य की श्रेणी में रखा गया है. उस वक़्त सरकार ने यह भी बताया था कि चार राज्यों ने विशेष राज्य का दर्जा देने का अनुरोध किया था, जिसमें बिहार, ओडिशा, राजस्थान और गोवा शामिल थे. इसके बाद आंध्र प्रदेश ने भी इसकी मांग की.
अरूणाचल प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, सिक्किम, मणिपुर, मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा, उत्तराखंड और मिजोरम को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है.
तत्कालीन योजना राज्य मंत्री अश्विनी कुमार ने बताया था कि विशेष श्रेणी का दर्जा राज्यों को राष्ट्रीय विकास परिषद देती है. इसके लिए कुछ मापदंड तय किए गए हैं ताकि उनके पिछड़ेपन का सटीक मूल्यांकन किया जा सके और इसके अनुरूप दर्जा प्रदान किया जा सके.
  1. अंतरराष्ट्रीय सीमा से राज्य की सीमा लगती हो
बिहार के मामले में केंद्र की भाजपा सरकार इन्हीं तकनीकी वजहों को पहले गिना चुकी है. भाजपा प्रदेश इकाई भी इन्हीं वजहों को गिनाती हैं.
लेकिन आर्थिक रूप से दस फ़ीसदी आरक्षण दिया जाना भी तकनीकी रूप से मुमकिन नहीं था, उसके लिए केंद्र सरकार तीन दिनों के भीतर कानून में बदलाव कर देती है, तो क्या जदयू की 15 साल पुरानी मांग को पूरा नहीं किया जा सकता है?
इस सवाल के जवाब में प्रदेश भाजपा प्रवक्ता निखिल आनंद कहते हैं, "देखिए ये मुद्दा पूरी तरह आर्थिक अध्ययन का मामला है, क्षेत्रीय असमानता का मामला है और आरक्षण का मामला सामाजिक उत्थान से जुड़ा मामला है. इन सभी को एक-दूसरे से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए."
छह चरण के मतदान बीत जाने के बाद भाजपा की राह आसान नहीं बताई जा रही है. ऐसे में जदयू की मांग का राजनीतिक मतलब क्या हैं?
इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "इतने समय तक जदयू की चुप्पी और इतने अंतराल के बाद विशेष राज्य के दर्जे का मुद्दा उठाया जा रहा है, तो जाहिर है कि लोग चौकेंगे कि ऐसा क्यों हो रहा है."
"मुझे लग रहा है कि नीतीश कुमार को अपना या फिर अपनी पार्टी का राजनीतिक भविष्य ख़तरे में लग रहा है, उसके मद्देनज़र ये बयान दिए गए हैं. अगर जदयू कोई संकट में फंसता है और आगे की चाल क्या होगी, यह उसकी पृष्ठभूमि तैयार करने की कोशिश लग रही है."
राज्य में दोबारा भाजपा के साथ आने के बाद विशेष राज्य के सवाल पर जदयू के नेता कहते थे कि वो इस मांग को पूरी तरह छोड़े नहीं हैं. विशेष पैकेज जो केंद्र की तरफ से मिला है, उससे बहुत हद तक हमारी मांग पूरी हुई है. सिर्फ़ विशेष राज्य के दर्जे का नाम नहीं मिला है.
वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से अपनी मांग उठाते हैं. "जब आप नरेंद्र मोदी के विरोध में थे, तब तो आपने ज़ोर डाला. और फिर जब साथ हो गए तो आपने इसे छोड़ दिया, इस पर चर्चा तक नहीं की. तो ज़ाहिर है कि सुविधा की राजनीति इसे ही कहते हैं."
हालांकि अंत में मणिकांत ठाकुर जदयू के बयान का सकारात्मक पक्ष भी गिनाते हैं और कहते हैं कि "हो सकता है कि भाजपा इसके लिए तैयार हो और जदयू के साथ भाजपा का जो संबंध बना है या आगे बरकरार रहा तो दोनों दलों को इससे एतराज नहीं होगा और अगर मोदी सरकार दोबारा बनती है तो दोनों मिल कर विशेष राज्य का दर्जा देने का रास्ता निकालेंगे."