Wednesday, May 15, 2019

विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के तकनीकी पेंच

साल 2011 में सरकार ने संसद को बताया था कि देश के कुल 11 राज्यों को विशेष राज्य की श्रेणी में रखा गया है. उस वक़्त सरकार ने यह भी बताया था कि चार राज्यों ने विशेष राज्य का दर्जा देने का अनुरोध किया था, जिसमें बिहार, ओडिशा, राजस्थान और गोवा शामिल थे. इसके बाद आंध्र प्रदेश ने भी इसकी मांग की.
अरूणाचल प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, सिक्किम, मणिपुर, मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा, उत्तराखंड और मिजोरम को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है.
तत्कालीन योजना राज्य मंत्री अश्विनी कुमार ने बताया था कि विशेष श्रेणी का दर्जा राज्यों को राष्ट्रीय विकास परिषद देती है. इसके लिए कुछ मापदंड तय किए गए हैं ताकि उनके पिछड़ेपन का सटीक मूल्यांकन किया जा सके और इसके अनुरूप दर्जा प्रदान किया जा सके.
  1. अंतरराष्ट्रीय सीमा से राज्य की सीमा लगती हो
बिहार के मामले में केंद्र की भाजपा सरकार इन्हीं तकनीकी वजहों को पहले गिना चुकी है. भाजपा प्रदेश इकाई भी इन्हीं वजहों को गिनाती हैं.
लेकिन आर्थिक रूप से दस फ़ीसदी आरक्षण दिया जाना भी तकनीकी रूप से मुमकिन नहीं था, उसके लिए केंद्र सरकार तीन दिनों के भीतर कानून में बदलाव कर देती है, तो क्या जदयू की 15 साल पुरानी मांग को पूरा नहीं किया जा सकता है?
इस सवाल के जवाब में प्रदेश भाजपा प्रवक्ता निखिल आनंद कहते हैं, "देखिए ये मुद्दा पूरी तरह आर्थिक अध्ययन का मामला है, क्षेत्रीय असमानता का मामला है और आरक्षण का मामला सामाजिक उत्थान से जुड़ा मामला है. इन सभी को एक-दूसरे से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए."
छह चरण के मतदान बीत जाने के बाद भाजपा की राह आसान नहीं बताई जा रही है. ऐसे में जदयू की मांग का राजनीतिक मतलब क्या हैं?
इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "इतने समय तक जदयू की चुप्पी और इतने अंतराल के बाद विशेष राज्य के दर्जे का मुद्दा उठाया जा रहा है, तो जाहिर है कि लोग चौकेंगे कि ऐसा क्यों हो रहा है."
"मुझे लग रहा है कि नीतीश कुमार को अपना या फिर अपनी पार्टी का राजनीतिक भविष्य ख़तरे में लग रहा है, उसके मद्देनज़र ये बयान दिए गए हैं. अगर जदयू कोई संकट में फंसता है और आगे की चाल क्या होगी, यह उसकी पृष्ठभूमि तैयार करने की कोशिश लग रही है."
राज्य में दोबारा भाजपा के साथ आने के बाद विशेष राज्य के सवाल पर जदयू के नेता कहते थे कि वो इस मांग को पूरी तरह छोड़े नहीं हैं. विशेष पैकेज जो केंद्र की तरफ से मिला है, उससे बहुत हद तक हमारी मांग पूरी हुई है. सिर्फ़ विशेष राज्य के दर्जे का नाम नहीं मिला है.
वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से अपनी मांग उठाते हैं. "जब आप नरेंद्र मोदी के विरोध में थे, तब तो आपने ज़ोर डाला. और फिर जब साथ हो गए तो आपने इसे छोड़ दिया, इस पर चर्चा तक नहीं की. तो ज़ाहिर है कि सुविधा की राजनीति इसे ही कहते हैं."
हालांकि अंत में मणिकांत ठाकुर जदयू के बयान का सकारात्मक पक्ष भी गिनाते हैं और कहते हैं कि "हो सकता है कि भाजपा इसके लिए तैयार हो और जदयू के साथ भाजपा का जो संबंध बना है या आगे बरकरार रहा तो दोनों दलों को इससे एतराज नहीं होगा और अगर मोदी सरकार दोबारा बनती है तो दोनों मिल कर विशेष राज्य का दर्जा देने का रास्ता निकालेंगे."

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